आरटीओ कर्मचारी की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेज बनाकर ट्रक को किया अपने नाम,
छोटे भाई ने सगे भाई को लगाया लाखों का चूना, सिविल लाइन पुलिस ने एक आरोपी को किया गिरफ्तार, एक फरार आरपी की तलाश
शशिकांत सनसनी छत्तीसगढ़

रायपुर _ सिविल लाइन थाना
“घर का लंका भेदी ढाए” — यह कहावत राजधानी रायपुर के सिविल लाइन थाना क्षेत्र में सामने आए इस मामले पर पूरी तरह खरी उतरती है, जहाँ छोटे भाई ने ही अपने सगे बड़े भाई के विश्वास के साथ धोखाधड़ी कर लाखों रुपये की ठगी को अंजाम दिया।
मामले का विवरण
प्रार्थी सपन राय, पिता स्व. हरिपद राय, निवासी छत्ताबेड़ा, नबरंगपुर (ओडिशा) द्वारा खरीदा गया एसएमएल इसूज़ू ट्रक (क्रमांक CG-04-MT-8422) उनके नाम पर पंजीकृत था। व्यवसायिक उपयोग के लिए उन्होंने यह ट्रक अपने छोटे भाई दीपक राय, निवासी सांई वाटिका, देवपुरी, रायपुर को सौंपा था।
दोनों भाइयों के बीच यह मौखिक सहमति थी कि दीपक राय प्रतिमाह ₹30,000 किराया देगा, लेकिन पारिवारिक विश्वास के चलते कोई लिखित अनुबंध नहीं किया गया।
धोखाधड़ी का खुलासा
पिछले दो वर्षों से किराया न मिलने और ट्रक वापस मांगने पर टालमटोल के बाद जब सपन राय ने जानकारी जुटाई, तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ।
सूचना के अधिकार (RTI) के तहत रायपुर आरटीओ से प्राप्त दस्तावेजों से पता चला कि—
23 फरवरी 2024 को
कृष्ण कुमार चंद्राकर, नोटरी (सिविल कोर्ट, रायपुर) के समक्ष
सपन राय के नाम से फर्जी शपथपत्र तैयार किया गया
किसी अन्य व्यक्ति को सपन राय बताकर खड़ा किया गया
फर्जी हस्ताक्षर कराकर
ट्रक का नामांतरण अवैध रूप से दीपक राय के नाम करवा लिया गया
पुलिस कार्रवाई
पीड़ित सपन राय की शिकायत पर सिविल लाइन थाना में अपराध क्रमांक दर्ज कर धाराएं—
419, 420, 467, 468, 471 एवं 120-B भादवि
के तहत मामला पंजीबद्ध किया गया।
आरोपी दीपक राय गिरफ्तार
तीन दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया
जिस व्यक्ति को फर्जी रूप से “भाई” बनाकर पेश किया गया था, उसकी तलाश जारी
बड़ा सवाल:
आरटीओ कर्मचारी और नोटरी पर कार्रवाई क्यों नहीं?
यह सवाल बिल्कुल वाजिब और गंभीर है।
कानूनी स्थिति
यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि
नोटरी ने पहचान सत्यापित किए बिना शपथपत्र किया, या
आरटीओ कर्मचारियों ने बिना समुचित जांच दस्तावेज स्वीकार किए,
तो वे भी सह-अभियुक्त (Co-Accused) बन सकते हैं।
फिलहाल कार्रवाई न होने के संभावित कारण
जांच प्रारंभिक चरण में है — पहले मुख्य आरोपी से पूछताछ
साक्ष्य संकलन — हस्ताक्षर सत्यापन, CCTV, दस्तावेजी मिलान
जानबूझकर मिलीभगत साबित करना आवश्यक — लापरवाही और षड्यंत्र में कानूनी अंतर
तकनीकी जांच लंबित — फोरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार
लेकिन यह भी सच है
यदि जांच निष्पक्ष रही और दबाव-मुक्त तरीके से आगे बढ़ी, तो—
नोटरी
आरटीओ के संबंधित अधिकारी/कर्मचारी
पर भी IPC की धाराओं एवं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई संभव है।
निष्कर्ष
यह मामला सिर्फ भाई-भाई के धोखे का नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र में संभावित मिलीभगत पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अब निगाहें पुलिस जांच पर टिकी हैं कि क्या यह कार्रवाई केवल एक आरोपी तक सीमित रहेगी या फर्जी दस्तावेज तैयार कराने वाले पूरे नेटवर्क तक पहुँचेगी।

